आपदा क़ुदरत का कहर या इंसानी ग़लती? जानने के लिए विस्तार से पढ़े

भारत के दक्षिण भारतीय राज्य केरल पर इस वक़्त जो विपदा आई है वो इंसान और पानी के बीच अपने अस्तित्व और अपनी जगह की लड़ाई का सबसे ताज़ा उदाहरण है.

ये उत्तराखंड, हिमाचल, कश्मीर, गुजरात, मुंबई और चेन्नई में पिछले दशक में अपनी जगह के लिए इंसानों को किनारे पर धकेलते पानी से उपजी आपदा से बिल्कुल अलग नहीं है, इन सभी जगहों पर पानी ने अपनी जगह वापस पाने के लिए इंसानों और उनके ‘विनाशकारी विकास’ को बुरी तरह किनारे कर दिया है.

इंसान हैं ज़िम्मेदार?

केरल फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (KFRI) के पूर्व निदेशक डॉक्टर पीएस. एसा का भी मानना है कि ये सब इंसानों का किया-धरा है. डॉक्टर एसा कहते हैं, “प्राकृतिक आपदाएं हमेशा आती रही हैं, लेकिन हम इंसानों ने मुश्किलों को बढ़ा दिया है, पहाड़ी इलाकों में धड़ल्ले से होता निर्माण कार्य और ढलानों पर बनी इमारतों ने नदियों और नहरों के रास्ते संकरे कर दिए हैं. नदियों के पानी को बहने के लिए जगह ही नहीं बची है.”
चेन्नई स्थित एनजीओ केयर अर्थ रिसर्च बायोडायवर्सिटी की प्रमुख डॉक्टर जयश्री वेंकटेशन का कहना है, “पिछले 20-25 सालों में विकास या यूं कहें कि इमारतें पहाड़ियों के ऊपर बनने लगी हैं, यही उत्तराखंड में हुआ था जहां आपने देखा कि बाढ़ के पानी ने कैसे इमारतों को उनकी नींव समेत नीचे गिरा दिया.” ऐसा भी नहीं है कि नदियों और नहरों के पास होने वाले निर्माण कार्य को सीमित करने के लिए कोई क़ानून नहीं है.

 

नदी के रास्ते में आ गए हैं इंसान

डॉक्टर वेंकटेशन ने कहा, “नदी अपने रास्ते पर ही है, यह अपना रास्ता नहीं बदल रही है, बात इतनी है कि हम इतने मूर्ख हैं कि नदियों के रास्ते में इमारतें बना रहे हैं और यही वजह है कि इमारतें आख़िरकार बाढ़ के पानी में बही जा रही हैं, इसलिए अगर सबसे संवेदनशील इलाकों में (जैसे उत्तराखंड और केरल) में छोटी-मोटी प्राकृतिक घटनाएं भी होती हैं तो इसे बड़ी आपदा बनते देर नहीं लगती.”
लेकिन केरल समेत बाकी जगहों पर बाढ़ के अलावा भी ऐसी चीजें हैं जिन्होंने मुसीबतों को बढ़ाया.
डॉक्टर सुलोचना गाडगिल के मुताबिक, “इसकी दो बड़ी वजहें हैं- उत्खनन और कृत्रिम झीलें. जब महाराष्ट्र में किसान पानी मांगते हैं तो उन्हें यह नहीं मिलता, लेकिन जब बारिश होती है तो यही पानी बह जाता है और बाढ़ आ जाती है.” डॉक्टर सुलोचना से सहमति जताते हुए डॉक्टर एसा कहते हैं, ” उत्खनन की वजह से भूस्खलन का ख़तरा हमेशा बना रहता है क्योंकि इससे ज़मीन कहीं न कहीं ढीली पड़ जाती है.”

समस्या पानी के प्रबंधन की भी

बांधों और कृत्रिम जलाशयों से पानी तभी छोड़ा जाता है जब यह ख़तरे के निशान से ऊपर पहुंच जाता है, इकोलॉजिस्ट (पारिस्थिकी तंत्र विशेषज्ञ) एस. फैज़ी कहते हैं, “केरल सबसे ज़्यादा जनसंख्या घनत्व वाले राज्यों में से एक है. इसका मुकाबला सिर्फ़ पश्चिम बंगाल ही कर सकता है. पूरा राज्य सेमी-अर्बन है. यहां घरों की कतारों के बीच में रुका हुआ पानी और धान के खेत देखने को मिलते हैं. राज्य समिति के सदस्य के तौर पर जब मैं एक दौरे पर यहां गया तो यह देखकर हैरान रह गया कि जहां पहले धान की खेती होती थी वहां छह मंजिला इमारत खड़ी थी.” फ़ैज़ी कोच्चि एयरपोर्ट का उदाहरण देते हैं जो उस जगह पर बना है जहां पहले धान की खेती होती थी. उन्होंने कहा, “इसी तरह दिल्ली के राष्ट्रपति भवन और लुटियन ज़ोन में आज भी बंदर और सांप पाए जाते हैं. पहले ये उनके रहने की जगह हुआ करती थी. कुदरत को किनारे नहीं धकेला जा सकता “
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