अहम सवाल यह है कि गैरसैंण का नाटक कब तक चलता रहेगा।

वाह सरकार- – गैरसैंण में सत्र का आयोजन जोखिमभरा कार्य दरअसल गैरसैंण को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां अपनी अपनी रोटी सेकने का काम करती है। दोनों ही पार्टियां गैरसैंण का स्थाई समाधान करने के पक्ष में नहीं हैं। क्योंकि कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही पता है कि यदि गैरसैंण का स्थाई समाधान हो गया तो चुनाव के समय मुद्दा ही गायब हो जाएगा। क्योंकि जब भी विधान सभा का चुनाव आता है। दोनों ही पार्टियां एक दूसरे को जमकर कोसती हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती हैं कि स्थाई राजधानी नहीं बनने के पीछे किस पार्टी की क्या चाल है। गैरसैंण का उपयोग चुनाव के दौरान राजीतिक पार्टियां करती है। ताकि पर्वतीय जनपदों के वोट बैंक को बटोरा जा सके।

अहम सवाल यह है कि गैरसैंण का नाटक कब तक चलता रहेगा। गैरसैंण को लेकर उत्तराखंड के लोगों की भावनाओं के साथ राजनीतिक पार्टियां कब तक खेलती रहेंगी। इसका समाधान तो होना ही चाहिए।

उल्लेखनीय है कि राज्य गठन के बाद से उत्तराखंड के लोगों की यह मांग है कि पहाड़ की राजधानी पहाड़ में होनी चाहिए। गैरसैंण को स्थाई राजधानी नहीं होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि यह क्षेत्र काफी पिछड़ा हुआ है। विकास शून्य है। गैरसैंण उत्तराखंड के लोगों के रोम रोम में बसा है और इसका भी समाधान होना चाहिए। केवल चुनाव के समय ही गैरसैंण पर राजनीति करना ठीक नहीं है। पर्वतीय लोगों को यह पता है कि जब गैरसैंण में सत्र चलेगा तब विधायकों और मंत्रियों की नजर गैरसैंण में फैली अव्यवस्थाओं पर जाएगी। तभी गैरसैंण का विकास संभव हो पाएगा।

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