हमारी छत्र -छाया ,दाना सयाणा

“हे बाबा मैं त यखि रण चांदू अफरा गौं ! अफरा गौं मुलक जन सचे ह्वे सकद हैकि जगा ! तख गर्मियों म छकी गरम अर ठंड्यों म बिज्यां ठण्ड ! पर कन क्य च अब यख रण बि कै दगड़ी च -नुन्याळ -ब्वारी ,नाती -नतेड़ा त सबि उदु चलि गिन ! हमारा पाड़ म यना उद्गार अक्सर सुणणा तैं मिलि जांदन । आज जब पलायन पहाड़ की नियति बणी गे ,भावनात्मक रूप से क्वे सबसि ज्यादा परेशान च त सि छन हमारा दाना लोग ।सि बिचारा भौत दुखी छन करों त क्य करों ! न यखुली पाड़ म रै सकदन न उपरि जगा म एडजस्ट करि सकदन । पलायन पाड़ों कु फैशन बणि गे ,जैकि आर्थिकी जथगा लैक होलि सु तथगा दुरू पलायन कलू । गौं म जु बुढया लोग छन तौंकि स्थिति बड़ी खराब च ,क्वी -क्वी भग्यान जरूर छन जौंका देखदारा छन निथर सि बिचरा कै तरां अफरु जीवन काटणा छन । जु अफरु बाल -बच्चों दगड़ी भैर सैरु म बि छन तौंकि स्थिति बि भौत अछि निच ।भलै हि कुछ नुन्याळ -ब्वारी बूढ़ -बुढ्यों कु खूब ध्यान रखदन लेकिन फिर बि जु स्वतन्त्रता अफरा घर म च स्य भैर कतै नि ह्वे सकदी । आज हम लोग जों चीजों क खातिर सबसी ज्यादा संघर्ष की स्थिति म ऐज्ञा सि छन भाषा ,लाणु – खाणु अर रीति – रिवाज़ । अर यों बातों तैं यदि क्वी सबसी ज्यादा मैसूस करदन त सि बुढ्या लोग ही छन ।
भाषा — आज पलायन होण सि बि अर घर -गौं म दूरसंचार क माध्यमों कि पोंछ से बि हमारी भाषा कु भौत तेजि सि लोप होणु च ।गौं म बि सार्वजनिक स्थलों पर लोग हिंदी म बात कन म ज्यादा अछू समझदन ! हमारी लोग भाषा क कई शब्द हरचणकि कगार पर छन । दाना -बुढ्या एं स्थिति सि भौत यकुलांस अर बिराणुपन सि मैसूस करदन केकि भाषा कि रसाण तौंते अलग हि ऊर्जा देंदी थै अर अफ्री भाषा क बोलदारु दगड़ी अपणत्व बि हौरे होन्दू ।
लाणु-खाणु — आज हमारू लाणु-खाणु बिल्कुल बदली गे ।समै अर सभ्यता क विकास क साथ यि परिवर्तन होंदे छन पर हम पर सार जरा ज्यादा हि लगदी ।आधुनिक अर नयु पैरवाक बि होणो समै क साथ भौत जरूरी च पर यु क्य कि हम अफरी परम्पराओं क प्रति उदासीन ह्वेज्ञा ! बुढ्यों यि स्थिति बि बिराणा होणा कु बोध करौंदिन जैका बारामा सि अक्सर बोलदे छन । हमारू खाणु त पूरी तरों से बदलगे । आज यनि स्थिति बि च कि गौं म बेटि -ब्वारि ब्याखनयों रोटि दगड़ी मैगि कु साग छन बणोणी ! चौमीन त अब मुख्य खाणु ह्वे हि गै ! अब जौं लोखुन क्वदा कि रोटि अर गगर्यास्ळओ घी च खायूँ तौं तैं जन -कन चीज म क्य रस लगण ! हमारा बृद्धजन चाहे सैहर म रौन चाहे गौं म, अफरा पहनावा अर खान -पान क प्रति भौत संवेदनशील रन्दन ।
रीति -रिवाज — आज हमारा रीति -रिवाजों म भौत फरक ऐगे । य बि बात सच च कि आज हमारा पाड़ का नौनी -नुन्ड्याळ देशु -विदेशु भौत अछि जगा पढ़णा ,नौकरी कना अर अफरु बिज़निस बढ़ोंणा छन पर तौंकि अफ्री संस्कृति कि जमीन सि दूर होणों दर्द बि यदि कै तैं सबसे जादा च त सु उम्र क ढलान पर पौंच्यां यूँ दाना -सायाणों तैं हि च ।कबि कै ब्यौ -बरात्यों म खाणु खाणकि लैन पर यों दाना -सयाणों तैं देखा त भौत कष्ट होंद । भौत संघर्ष करदा दिख्यन्दन बिचारा तैं खाणक अर सर्मान्दा अलग छन केकि थौं सणि तनि जग पर खाणों ढब नि औन्दू । आज गौं म बि जु वृद्धजन छन सि अफु तैं समाज सि भौत अलग -थलग मैसूस करदन ।ब्याखन्यों बगत कुछ बुढ्याजी लोग कखि कै जगा पर छवी- बात लैक अफरा पुराणा टैम कि याद म रंगमत ह्वे जांदन पर अजौं घर जैक अफ्री कुणेठि म टप बैठी जांदन ।जौं भग्यानु क नाति -नातेड़ा छन तौंकु जरूर कुछ टैम पास अछू सि ह्वे जांद । फिर नुन्याळ -ब्वारी ,नाति -पोता टीबी अर फोनु म अर अफरा कुराबुरा पर लगि जांदन ,बुढ्या बिचारा अफरा अकेलापन म रै जांदन । क्वी छुयाळन ऐ जाओ त बिचारा खुश ह्वे जांदन ।चा पेणा बाना थोड़ा छवी हौर लगि जांदिन । आज झहैँ अवस्था पर यि लोग छन भोल सबुन औण हि च तब य अनुभूति हम तैं बि ह्वे हि जालि ! अबि सबसी जरूरी य कि हम दाना -बुढ्यों कि भावनाओं कु जरूर सम्मान करों अर तौंते समै द्यो ।


लेखक गिरीश बडोनी जी की कलम से।

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