“कर्मठ,जुझारू और ईमानदार
ये कहकर मैं चुनाव जीता हूँ,
जीत कर घर-गांव में नहीं
बस ये समझ लो
मैं सफर में हूँ।

खूब मौज में हूँ
मस्ती में हूँ और मजे में हूँ
न हाथ जोड़ने का झंझट
न किसी चीज का संकट,

सब शर्ते भी अपनी हैं!
उसी सौदे में लगा हूँ,
भावी प्रमुख और अध्यक्ष को
अपनी धौंस दिखा रहा हूँ
कोठी-गाड़ी और गड्डी के बदले
अपना वोट बेच रहा हूँ
इस चुनाव को मैं भी
तमाशा बना रहा हूँ
लोकतंत्र को उनकी तरह ही
तमाचा लगा रहा हूँ।

अपने लिए नहीं है
यहाँ कोई कमी
पोशाक की तरह ही
हर दिन होटल भी बदल रहा हूँ,
इस बहाने बीवी को भी
सैर,शहर की करवा रहा हूँ,

लौटकर आऊँगा मैं जल्दी
बस हफ्ते भर के लिये हूँ
मेरे प्यारे वोटरों और सपोर्टों
तुम्हारे बीच का ही तो हूँ
इस सुहाने सफर पर
कुछ अपने लिए समेट रहा हूँ,

लौटकर आऊँगा
कुछ दिनों तक तुमसे
नजर बचा लूँगा
इस पर भी मुझे
शर्म नहीं, लाज नहीं
बस ये समझ लो
तुम्हारा ही तो जनप्रतिनिधि हूँ
तुम्हारी अनुकंपा से ही
इस व्यापार का
इस बाजार का
छोटा सा हिस्सा बना हूँ
एक छोटा सा किस्सा बना हूँ।।”
———-ये समझ लो, मैं सफर में हूँ———–


-@शैलेंद्र गोदियाल

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