फिलहाल समझ नहीं आ रहा, लेकिन समझना बहुत जरूरी है।

पलायन संभावनाओं की तलाश में अपने पूर्वजों की जगह-जमीन छोड़कर आगे बढ़ जाने का नाम है। हालांकि इसका अस्तित्व न केवल भूगोल से बल्कि उस विचारदृष्टि से भी संबंधित है, जिससे इतर जाना कभी कभी हमें मानसिक पलायन की श्रेणी में ला खड़ा कर देता है। खैर जो भी हो, दोनों स्थितियां किसी न किसी अंतर्द्वन्द्व से उपजे परिणाम का ही एक व्यावहारिक स्वरूप व पर्याय हैं। फिलहाल मुद्दा यह है कि आज पहाड़ (रुद्रप्रयाग) का एक और गांव (ढिंगणी) पूरी तरह वीरान हो गया। पिछले कुल 8 सालों से इस गांव में रह रहे इकलौते बुजुर्ग दंपति का पूरा संघर्ष, यहां की कठिन परिस्थितियों की उस विभीषिका से वैसे ही हार गयी जैसे मौत के सामने जिंदगी लाचार हो जाती है, असहाय होकर खुद पर झुंझलाती है और आखिरकार हार जाती है। हरेक साल खुदकुशी के शिकार होते ये गांव इस राज्य या पूरे देश के लिए किसी बड़ी चेतावनी से कम नहीं । कभी कभी मुझे यह भी महसूस होता है कि पलायन और पराजय में कोई भेद नहीं। पलायन भी एक पराजय है। पर किसका ? उस गांव का, ग्रामीणों का, व्यवस्था का, सरकार का या फिर हम सबका, फिलहाल समझ नहीं आ रहा, लेकिन समझना बहुत जरूरी है।

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