शीत ऋतु में अचानक वर्षा हो जाये तो सर्दी थोड़ी अधिक बढ़ जाती है । हम मनुष्यों से लेकर पशु-पक्षी आदि सभी ठिठुरने लगते हैं ।

शार्दूलविक्रिड़ित ” छन्द में एक गढ़वाली श्लोक व्याख्या सहित ।

शीत ऋतु में अचानक वर्षा हो जाये तो सर्दी थोड़ी अधिक बढ़ जाती है । हम मनुष्यों से लेकर पशु-पक्षी आदि सभी ठिठुरने लगते हैं । यह श्लोक भी शीत ऋतु की वर्षा के समय का है ….
परदेश में पहाड़ी व्यक्ति सर्दी की पहली बारिश देखकर कल्पना कर रहा है कि –

*” देखा! घुघुती चखुली वा घिंड़डी ,
*डाँड्यूँ  मा फुर्र उड़गेनी ,
*चौका कोणा मा गौड़ी बाछी छन बंधी ,
*घासौ रमाणी होली ।
*ह्यूँदै बरखन डाँडी काँठी होली भिजीं,
*कुयेडिन सजीगे होली ।
*दादा छज्जा मा हुक्का लेकि होला बैठ्यां,
*दगड्यों की साज होली बणीं ।। ”

अर्थात-  शीत ऋतु में वर्षा के बाद दूसरे दिन भी मौसम खराब था। देखो ! ऐसी सर्दी में घुघुती, चखुली, घिंड़डी ( गौरैया ) आदि पहाड़ी पक्षी वापस जंगल की ओर उड़ गयी होंगी। दो दिन से बारिश के कारण गौशाले में बंद गाय और उसकी बछिया आज बाहर आँगन में आई होंगी और कोने में बैठे भूखवश रमा रहीं होंगी । सर्दी की पहली बारिश से वन-वृक्ष अच्छी तरह भीग गये होंगे और चारों तरफ कोहरे ने अपनी छटा बिखेरी होगी । ऐसे में दादाजी भी आज सर्दी का लुफ्त उठाने छज्जे में हुक्का लेकर बैठ गए होंगे और अपने बुजुर्ग साथियों के साथ मिलकर हुक्कापान कर रहे होंगे ।

©® – अमित नैथानी ‘मिट्ठू’

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