सोचा था कि वो जो सपने उसने देखें हैं उन्हें जल्द ही पूरा करेगा । लेकिन क्या पता था कि कोरोना नामक महामारी से उसका पाला पड़ेगा।

कोरोना नहीं बल्कि भय ले रहा लोगों की जान ?

देश और दुनिया आज एक महाभयंकर जंग लड़ रही है। नाम है ” कोरोना ” चाइना से शुरुआत होते होते आज यह महामारी पूरे दुनिया में फैल गई है। ऐसे में अपनों की चिंता सताने लगी। गरीबी, लाचारी और बेरोजगारी ने ऐसी कमर तोड़ी की लोग जिन आंखों में कुछ सपने लेकर घर से कुछ कर गुजरने को निकले थे, आज उन्हीं की आंखों में अब घर आना एक सपना बन गया। हज़ारों की तादाद में लोग सड़कों पर अचानक आ गए। ” लक्ष्य “- किसी भी हाल में घर पहुंचना।

यह लक्ष्य कुछ आद लोगों ने गिरते-पड़ते पार कर लिया। लेकिन कुछ बदनसीब भी हैं जिनको कोरोना तो नहीं लेकिन कोरोना के भय ने लील लिया। ऐसा ही मामला उत्तराखंड के राहुल का आया है। महज 20 साल की उम्र में वो भी घर से आंखों में कुछ सपने लेकर निकला । सोचा था कि वो जो सपने उसने देखें हैं उन्हें जल्द ही पूरा करेगा । लेकिन क्या पता था कि कोरोना नामक महामारी से उसका पाला पड़ेगा। कोरोना से तो वो जैसे तैसे बच निकला लेकिन अपनी जिंदगी से जंग न लड़ सका। 100 किलोमीटर पैदल चलकर राहुल जैसे तैसे अपने घर के पास क़वारन्टीन सेंटर तो पहुंच गया लेकिन काल से न लड़ सका। दरअसल राहुल डिहाइड्रेशन का शिकार हो गया था। राहुल ने सोचा भी नहीं होगा कि सैकड़ों किलोमीटर की दूरी नापने के बाद उसकी मौत घर की दहलीज पर पहुंच कर होगी।

कहने का तात्पर्य है कि भले ही हमें राहुल की मौत कचोरती हो, सौ सवाल ज़हन में आते हों। लेकिन फिलहाल जिस परिस्थिति में देश दुनिया है ऐसे में यही बेहतर है कि जो जहां है वो वहीं ही रहे। ताकि आप भी राहुल जैसे उदाहरण न बन सकें । प्रशाशन आपको लाने के लिए प्रयासरत है। क्योंकि कोरोना आपकी जान तो बाद में लेगा , लेकिन भय पहले आपकी जान ले लेगा।

बाकी लोग भी इस बात का ध्यान रखें कि हरसंभव मदद को आगे आएं। ताकि किसी के सपने अधूरे न रहें । और सरकारों को भी ज्यादा समय न गवां कर प्रवासियों की घर वापसी करनी होगी ताकि सब्र का बांध न टूट पाए।

पूर्णिमा मिश्रा  देहरादून

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