लोक ज्यादा जरुरी या संस्कृति ? आखिर ये सब उत्सव किसके लिये ??पिछ्ले कुछ वर्षों से संस्कृति के नाम पर बड़े-बड़े मन्चों पर भव्य आयोजन करने की प्रथा सी बन गई है… हर आयोजन गत वर्ष के आयोजन व अन्य संस्थाओं के कार्यक्रमों की तुलना में और अधिक भव्य और विशाल करने की होड़ सी लगी हुई है…

अधिकतर कार्यक्रमों में 3 से 5 दिन या कहीं कहीं एक हफ्ते से अधिक दिनों तक आयोजन होता है, जिसमें आयोजकों द्वारों लाखों और करोड़ों रुपये तक का खर्च किये जाते हैं… और हासिल.. कुछ भाषण, कुछ तालियां, मन्चों के पीछे धूल फांकती फ़ूल-मालायें, कुछ गीत, कुछ नृत्य और “भात खाये खिसके….”इतिहास गवाह है कि पहाड़ी लोग कर्मठ होने के साथ-साथ उत्सवधर्मी भी होते हैं। एक तरफ़ जहां ये लोग सदियों से अपनी पहाड़ सी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते आयें हैं वहीं दूसरी तरफ़ अपनी लोक संस्कृति से जुड़े पर्वों को हर्ष और उल्लास से मनाते आये हैं।

शायद यही कारण रहा होगा कि संस्कृति के दस्तावेजों में पहाड़ में कई उत्सव सप्ताह से लेकर एक माह तक हर्ष-उल्लास से मनाये जाने के प्रमाण मिलते रहे हैं।

संभवतया यह वह दौर रहा होगा जब पहाड़ समृद्ध रहा होगा। खेत लहलहाते रहे होगें, गांव आबाद रहे होंगे, पहाड़ इतना सक्षम रहा होगा कि वो दूध-दही की होली खेल सके…

लेकिन आज तस्वीर उलट चुकी है…गांव के गांव खाली पड़े हैं, और आधिकतर खाली होने की कगार पर हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर पहाड़ की स्थिति किसी से छुपी नहीं है, राज्य में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं नगण्य हालात में हैं।पहाड़ और मैदान के अन्तर को परिभाषित करती, खिंच आई मानसिक लकीर ने पहाड़ को खाली करने के साथ हाशिये पर खड़ा कर दिया है। कुल मिलाकर स्थितियां बुरे से भी बुरे हैं….

बचपन में एक कहावत पढी थी.. “रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था”.. .. का अर्थ अब समझ आ रहा है । हम भी “नीरो” जैसे ही हो गये हैं… लोक खत्म होने के कगार पर है, और हम संस्कृति के संरक्षण संवर्धन का ढोल पीट रहे हैं, गीतों और नृत्यों से शामें सजा रहे हैं.. उत्सव मना रहे हैं ।सरकारें क्या कर सकती थी और उन्होने क्या कर दिखाया ये स्थिति पिछ्ले 18 सालों में पूरी तरह से साफ हो चुकी है…

मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि जनपद स्तर से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक की सभी उत्तराखंडी सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं को अपनी जिम्मेदारी समझते हुये नाच-गाने के मन्चों से उतरकर आगे आना चाहिये, भव्य आयोजनों का स्वरूप बदलकर उसे सीमित करते हुये, जो विसंगतियां समाज में पनप आई हैं उनके सुधार हेतु काम करना चाहिये…

उन्हे चाहिये कि प्राथमिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्रों में पूरी इमानदारी से काम करते हुये सामुदायिक विकास की दिशा में काम करें , युवाओं को स्थानीय रोजगार के प्रति जागरूक करते हुये उन्हे उनके मूल स्थान पर ही रोजगार से जोड़ें, साथ ही बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारते हुये उन्हे नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ायें ताकि एजुकेशन, ग्रेड्स, मार्क्स की दौड़ में वो इन्सान भी बने रहें….

आज उत्तराखंड के परिपेक्ष में संस्कृति से ज्यादा लोक बचाने की आवश्यकता आ पड़ी है.. हो सकता है आपके प्रयास से पूरे उत्तराखंड की तस्वीर ना बदले लेकिन कुछ एक गावों में हालात अवश्य सुधर सकेंगें… याद रखिये सूर्यास्त के बाद जग में अन्धियारा हो जाता है लेकिन एक छोटा सा दीपक स्वयं जलकर आस पास के वातवरण को प्रकाशित करता है…

Vinay kd

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