ब्वे बाबों की खैरी का गीत, ऊंकी हार मा तेरी जीत.. तेरू कबि न कभी त एहसास जगलू..!!

(मेरी कलम से एक गढ़वाली कविता)
दिल से सूण.. “त्वे भी अच्छू लगलू”

मेरी बात, मेरा जज़्बात, जिकुड़ी कू तार, मेरा दिल कू खुमार..!!
बस तू दिल से सूण, त्वे भी अच्छू लगलू ।।

जब कुछ अच्छु सी दिखें जांद, बस वी दिल से लिखें जांद .!!
दिल की बात दिल से ही समझेंद, यू त्वेसे बेहतर कू जणंदू.??
मेरा गीतों थें सिर्फ गीत न समझ, मैथें सिर्फ मायादार मीत न समझ.. कुछ त अनुभव ह्वलू कन नी बगलू..!!
बस तू दिल से सूण, त्वे भी अच्छू लगलू ।।

यादों मा नी ऐं गौ-गुठ्यार, स्वीणा मा भी नी गौ धार पार.!!
फिर भी झणी किले..खुद सी लगीं रैंद, कि कुछ त छुटुणु च..
छुटणु क्या च बताण चाणू छों, दिल की पीड़ा त्वे बिंगाण चाणू छों.. कोशिश कनु छों, कन नी बिंगै सकुलू..!!
बस तू दिल से सूण, त्वे भी अच्छू लगलू ।।

भले ही अजाण छे तू मेरा बिचारों से, पर छै छैं मयळु तु अपणा संस्कारों से.!!
देश दुनिया मा तू कखी भी रै, पर अपणो सणी न बिसरी जै..
ब्वे बाबों की खैरी का गीत, ऊंकी हार मा तेरी जीत.. तेरू कबि न कभी त एहसास जगलू..!!
बस तू दिल से सूण, त्वे भी अच्छू लगलू ।।

धन्यवाद सहित :
लिख्वार: दलीप रावत 🙏

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