कुछ कुछ जगहों पर जागरूक लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन यह सब अब मुझे आंच पर उबल रहे दूध के उबाल जैसा लगने लगा है।

अनमने मन से ही सही!
बीते पखवाड़े से अस्त-व्यस्त और कुछ कुछ त्रस्त रहा। बहुत कुछ साझा करने का मन था लेकिन इनको यादों की शक्ल में कोठार के किसी कोने में ठूस रखा है। बेटियों को लेकर हमारे देश में जिस तरह का माहौल व्याप्त है उसमें बाकी की चीजों पर लिखना अपराधबोध जैसा लग रहा है।
आपराधी बेखौफ घूम रहे हैं, नागर समाज त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहा है, सोशल मीडिया पर लोग अपनी अपनी राय रख रहे हैं, कुछ कुछ जगहों पर जागरूक लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन यह सब अब मुझे आंच पर उबल रहे दूध के उबाल जैसा लगने लगा है।
व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि समाज में बेटियों पर हो रहे इन कृत्यों के जिम्मेदार हमारे हुक्मरान हैं। भई नेशन-स्टेट और नागर समाज के बीच जो ऐतिहासिक करार है वह यही तो है कि नागर समाज अपने श्रम से इस समाज को बेहतर करने में योग देगा और स्टेट उनकी रक्षा और बेहतरी के लिये प्रयत्नशील रहेगा। नागर समाज तो पिला पड़ा है टैक्स पर टैक्स देने में लेकिन स्टेट है कि नदारद है।
तो फिर क्या फायदा ऐसे नेशन-स्टेट का जहां शुरूआती करार ही पूरा न किया जा रहा हो। तो क्यों न जितनी जल्दी हो सके इस नेशन-स्टेट को नेस्तनाबूत किया जाय या फिर नागर समाज भी अपनी जिम्मेदारी से मुकर जाय।
मुझे लगता है कि सरकार चाहे तो कहीं कोई बाल भी बांका नहीं हो सकता। राम मंदिर इसका जीता जागता उदाहरण है। अगर सरकार अपनी पर आ जाय तो उसको करना मुश्किल नहीं है।
पहली बात, सरकार की हीला हवाली की वजहों से न्याय में देरी क्या महा देरी के चलते इस तरह की घटनाओं में तेजी आती है। क्यों नहीं सरकार जितने जज और कानूनी प्रक्रिया में जितने मानव श्रम की जरूरत है उसको पूरा करती। साथ ही महंगी हो चुकी न्यायिक प्रक्रियाओं के लिये ठोस कदम उठाती।
दूसरी बात, क्यों नहीं सरकार जिस थाने में ऐसी घटना होती है वहां की पूरी फोर्स को बेदखल कर देती। यदि पुलिस जी इसको करने में नाकाम रहती है तो बहुत लोग है भई लाईन में वे इस जिम्मेदारी को निभा लेंगे। अब आप कहेंगे पुलिस भगवान थोड़े है। तो फिर पुलिस विभाग को खत्म कर भगवान को ही तैनाती के लिये लगा देना चाहिए।

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